शून्य (०) गणितीय क्रांति का मौन प्रतीक

एवं अद्वितीय तत्समक अवयव शून्य का उपयोग केवल अंकगणित तक सीमित नहीं है; यह बीजगणित, कलन (कैलकुलस), और आधुनिक गणितीय सिद्धांतों में भी महत्वपूर्ण भूमिका

(Zero (0): The silent mns24news.com) :- शून्य (०) केवल एक अंक नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक खोजों में से एक है। आज प्रचलित सभी स्थानीय मान पद्धतियों में शून्य एक अपरिहार्य प्रतीक के रूप में प्रयुक्त होता है। इसके बिना न तो बड़ी संख्याओं का सही निरूपण संभव है और न ही आधुनिक गणित, विज्ञान व तकनीक की कल्पना की जा सकती है। गणितीय दृष्टि से शून्य स्वयं एक पूर्ण संख्या है, जो पूर्णांकों और वास्तविक संख्याओं के लिए योग का तत्समक अवयव (Additive Identity) माना जाता है, अर्थात किसी भी संख्या में शून्य जोड़ने पर संख्या अपरिवर्तित रहती है। भारत को शून्य की अवधारणा और उसके व्यावहारिक उपयोग का जन्मस्थान माना जाता है।

इसका एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण मध्य प्रदेश के ग्वालियर

दुर्ग में स्थित प्राचीन ‘चतुर्भुज मंदिर’ में देखने को मिलता है।

प्रासंगिक बना 2025 में भी *67 और “67” तकनीक व इंटरनेट का अनोखा संगम

इस मंदिर की दीवार पर शून्य (०) का स्पष्ट अंकन उकेरा हुआ है, जिसे शून्य के लेखन का दूसरा सबसे पुराना ज्ञात उदाहरण माना जाता है।तिहासकारों और विद्वानों के अनुसार यह शून्य लगभग 1500 वर्ष पहले उकेरा गया था, जो गुप्तकालीन या उत्तर-गुप्तकालीन भारतीय गणितीय परंपरा की समृद्धता को दर्शाता है। चतुर्भुज मंदिर में अंकित यह शून्य इस बात का प्रमाण है कि उस समय भारत में न केवल शून्य की अवधारणा विकसित हो चुकी थी, बल्कि उसका प्रतीकात्मक प्रयोग भी व्यापक रूप से होने लगा था। यह खोज भारतीय गणितज्ञों की वैज्ञानिक सोच और बौद्धिक श्रेष्ठता को रेखांकित करती है। आज शून्य के बिना न तो गणना संभव है, न कंप्यूटर, न अंतरिक्ष विज्ञान और न ही आधुनिक अर्थव्यवस्था। ग्वालियर का यह ऐतिहासिक शून्य हमें याद दिलाता है कि गणित की इस क्रांतिकारी खोज की जड़ें भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा में गहराई से समाई हुई हैं।

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